जिस वस्तु को हम बेकार कहते हैं, वह कई बार गलत जगह पड़ी उपयोगी चीज होती है। कल्पना हमें उसे फेंकने से पहले यह पूछना सिखाती है: इसकी जरूरत किसे है, और इसे उपयोगी बनाने के लिए क्या बदलना होगा?
2001 में मलावी के विम्बे गाँव में विलियम कामक्वाम्बा के सामने एक कठिन सवाल था। अकाल के कारण उनके परिवार के लिए स्कूल की फीस चुकाना संभव नहीं रहा था। पढ़ाई छूट गई, लेकिन उन्होंने पुस्तकालय जाना जारी रखा। वहीं उन्हें पवन ऊर्जा पर एक पुस्तक मिली और उन्होंने कबाड़ में पड़े साइकिल के पुर्जों, प्लास्टिक पाइप और दूसरी छोड़ी हुई चीजों से पवनचक्की बनाने का प्रयास शुरू किया।
उन्हें पहले से मालूम नहीं था कि वह ढाँचा काम करेगा। उपलब्ध सामान किसी तैयार किट का हिस्सा नहीं था। हर वस्तु को उसके पुराने काम से अलग देखकर नई भूमिका देनी थी। अंततः पवनचक्की ने बिजली पैदा की। इस घटना का विवरण विलियम कामक्वाम्बा और ब्रायन मीलर की पुस्तक The Boy Who Harnessed the Wind में दर्ज है।
यह कहानी गरीबी को सुंदर बनाकर पेश करने का कारण नहीं देती। विलियम की कठिनाई वास्तविक थी। फीस का अभाव, अकाल और सीमित साधन ऐसी स्थितियाँ हैं जिन्हें दूर किया जाना चाहिए, सराहा नहीं। कहानी का मूल्य अभाव में नहीं, उस दृष्टि में है जिसने अनुपयोगी समझी गई वस्तुओं के भीतर एक नया संबंध देखा: यहाँ पड़ा सामान, वहाँ मौजूद जरूरत, और दोनों को जोड़ सकने वाला श्रम।
कचरे से पहले संबंध देखिए
हम अक्सर किसी वस्तु का मूल्य केवल इस आधार पर तय करते हैं कि वह हमारे लिए कितनी उपयोगी है। पुराना फोन, अतिरिक्त फर्नीचर, बचा हुआ निर्माण-सामान, बंद पड़ी मशीन या अलमारी में रखे बर्तन हमारे काम के नहीं रहे, इसलिए वे हमें बेकार दिखाई देते हैं।
मगर “मेरे काम का नहीं” और “किसी के काम का नहीं” दो अलग बातें हैं।
कल्पना इस दूरी को पहचानती है। वह पूछती है कि वस्तु किस हालत में है, उसे सुरक्षित रूप से कौन इस्तेमाल कर सकता है, और उसे वहाँ पहुँचाने में कितना श्रम लगेगा। कभी उत्तर दान होता है। कभी मरम्मत, पुनः बिक्री, साझा उपयोग या जिम्मेदार पुनर्चक्रण। कभी वस्तु सचमुच अनुपयोगी होती है और उसे सुरक्षित तरीके से हटाना ही उचित होता है।
यहाँ समझदारी जरूरी है। टूटी, असुरक्षित या अपमानजनक वस्तु देकर हम उदारता नहीं दिखाते। दान किसी दूसरे व्यक्ति को अपने कचरे का रखवाला बनाने का नाम नहीं है। अच्छी देने की आदत पाने वाले की गरिमा, वास्तविक जरूरत और वस्तु की गुणवत्ता का ध्यान रखती है।
उदारता धन से पहले ध्यान माँगती है
नियमित उदारता केवल बैंक खाते से रकम घटाने की क्रिया नहीं है। यह ध्यान का अभ्यास है। जब हम देने के लिए पहले से जगह बनाते हैं, तो धीरे-धीरे लोगों की जरूरतें हमें अधिक साफ दिखाई देने लगती हैं।
ईसाई दृष्टि में संसाधन केवल निजी उपभोग के साधन नहीं हैं। वे सौंपे गए साधन हैं, जिनका उपयोग प्रेम, न्याय, जिम्मेदारी और पड़ोसी की भलाई के लिए किया जा सकता है। इसका अर्थ हर वस्तु बचाकर रखना नहीं है। इसका अर्थ है स्वामित्व के साथ उत्तरदायित्व जोड़ना।
घर या कारोबार में एक सरल समीक्षा उपयोगी हो सकती है। पिछले छह महीनों से न इस्तेमाल हुई चीजों की सूची बनाइए। हर वस्तु के सामने चार विकल्प लिखिए: रखना, बेचना, देना या जिम्मेदारी से हटाना। फिर देने वाली वस्तुओं के लिए किसी व्यक्ति या संस्था की वास्तविक जरूरत की पुष्टि कीजिए। इस छोटे अभ्यास से अव्यवस्था घट सकती है और उपयोगी संसाधन सही हाथों तक पहुँच सकते हैं।
समय और कौशल पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। किसी विद्यार्थी का बायोडाटा सुधारना, पड़ोस के छोटे दुकानदार को हिसाब व्यवस्थित करना सिखाना या किसी परिवार को विश्वसनीय जानकारी समझने में मदद करना, ये भी संसाधनों का उपयोग हैं। कई बार हमारे पास देने के लिए अतिरिक्त पैसा कम होता है, पर अनुभव, औजार, संपर्क या कुछ घंटे उपलब्ध होते हैं।
अभाव का सम्मान करना उसे स्वीकार करना नहीं है
संसाधनों के नए उपयोग की चर्चा आसानी से एक खतरनाक मोड़ ले सकती है। हम कह सकते हैं कि जरूरतमंद लोग कम में भी रास्ता निकाल लेते हैं, इसलिए व्यवस्था बदलने की आवश्यकता कम है। यह सोच उनकी रचनात्मकता की प्रशंसा करते हुए उनकी कठिनाई का बोझ उन्हीं पर डाल देती है।
विलियम कामक्वाम्बा की पवनचक्की हमें यह नहीं सिखाती कि बच्चों की शिक्षा फीस के अभाव में रुकना ठीक है। वह दिखाती है कि क्षमता वहाँ भी मौजूद हो सकती है जहाँ अवसर और साधन कम हैं। सही प्रतिक्रिया केवल किसी असाधारण व्यक्ति की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ बनाना है जिनमें लोगों को बुनियादी अवसर पाने के लिए असाधारण संघर्ष न करना पड़े।
उदारता इसलिए राहत और न्याय दोनों पर ध्यान देती है। तत्काल जरूरत के लिए भोजन, वस्त्र या धन उपयोगी हो सकता है। लंबे समय के लिए उचित मजदूरी, ईमानदार व्यापार, कौशल-विकास और सम्मानजनक अवसर आवश्यक हैं। एक पक्ष दूसरे का स्थान नहीं लेता।
देने की आदत हमारी दृष्टि बदलती है
महीने की शुरुआत में देने के लिए तय हिस्सा रखना एक आध्यात्मिक और व्यावहारिक अनुशासन बन सकता है। इससे धन की पकड़ ढीली पड़ती है और “कितना और चाहिए?” के साथ “कितना बाँटा जा सकता है?” का प्रश्न भी उठता है। राशि हर व्यक्ति और परिवार की परिस्थिति पर निर्भर करेगी। उद्देश्य दिखावा या अपराधबोध नहीं, नियमित और विचारपूर्ण उदारता है।
अगली बार कुछ फेंकने से पहले तीन प्रश्न पूछिए: क्या यह सुरक्षित और उपयोगी है? किसे इसकी सचमुच जरूरत हो सकती है? इसे सम्मानपूर्वक पहुँचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
विम्बे में पड़े पुराने पुर्जे अपने आप बिजली नहीं बने थे। एक व्यक्ति ने पुस्तक से सीखा, वस्तुओं के बीच नया संबंध देखा और मेहनत से उन्हें जोड़ा। हमारे घरों, कार्यस्थलों और खातों में भी ऐसे संसाधन हो सकते हैं जिनका अगला उपयोग अभी दिखाई नहीं देता। उदारता उस उपयोग को खोजने की आदत बना सकती है।
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