जब रविवार की खुशियाँ सोमवार की खालीपन नहीं भर पाती
आपके सप्ताह का सबसे मजबूत दिन और आपके सप्ताह का सबसे कमजोर दिन एक ही चीज़ के बारे में है: क्या आप जानते हैं कि आप क्यों यहाँ हैं। अगर रविवार को सारी खुशियाँ मिलीं पर सोमवार सुबह 6 बजे फिर भी खाली लगता है, तो समस्या दिन नहीं है, समस्या यह है कि खुशी और उद्देश्य अलग-अलग चीजें हैं।
अप्रैल में नीता का रविवार
नीता ने अपना पूरा रविवार सजा दिया था। दोपहर को परिवार के साथ मसाला डोसे खाने गई, तीन साल की अपनी भतीजी के साथ पार्क में खेला, शाम को अपनी सबसे पुरानी सखी से फोन पर डेढ़ घंटे की बातचीत की। बिस्तर पर जाते समय उसका दिल हल्का था। जीवन अच्छा लग रहा था।
पर सोमवार सुबह जब वह ऑफिस के लिए निकली, तो वही खालीपन वापस आ गया।
न केवल सप्ताह की व्यस्तता के कारण नहीं। ऑफिस में उसके पास एक प्रोजेक्ट था जिसके लिए उसे अपनी राय देनी थी, पर वह राय देने से बचती रही। उसकी एक नई टीम मेंबर थी जो संघर्ष कर रही थी (किसी ने उससे पूछा भी नहीं कि वह कैसे कर रही है। और नीता जानती थी कि ये दोनों काम उसके करने के लिए थे। जब वह अपना डेस्क खोलने लगी, तो रविवार रात की वह खुशी सब गायब हो गई। उसकी जगह एक अलग भावना आ गई) न गुस्सा, न उदासी। सिर्फ खालीपन। ऐसे लगा जैसे वह जानती है कि वह क्या करना चाहिए, पर नहीं कर रही।
खुशी की सीमा
हमारी संस्कृति में एक अजीब विश्वास है: अगर आप रविवार को काफी खुश हो जाएं, तो शायद सोमवार सहन करने लायक बन जाएगा। लेकिन यह गणित काम नहीं करता। खुशी अस्थायी होती है। जानबूझकर ऐसी होती है। यह आती है, और जाती है। तुम्हारा दिन उसके साथ उड़ता है। सप्ताह उसे भर देता है।
यही कारण है कि सप्ताह भर की खाली भावना केवल "अधिक प्रमोशन, अधिक धन, अधिक छुट्टियाँ" से नहीं भरती। क्योंकि उद्देश्य खुशी नहीं है। उद्देश्य एक जिम्मेदारी है जो आपने अपनी मर्जी से ली है। और जिम्मेदारी आपको खुशी नहीं देती। पर वह आपको कुछ देती है जो ज्यादा गहरा है: वह आपको पता चलता है कि आप किसलिए यहाँ हैं। यह अंतर वह है जो "कभी-कभी अच्छा महसूस करने" को "मुझे पता है कि मैं क्यों यहाँ हूँ" में बदल देता है।
नीता का मंगलवार
नीता ने मंगलवार सुबह कुछ और किया। जब वह ऑफिस गई, तो उसने अपनी नई टीम मेंबर को अकेले पकड़ा। "तुम कैसी हो? सच में बताना। यह काम मुश्किल लग रहा है न?" पचीस मिनट की बातचीत थी। इतने ही में काफी था। उस टीम मेंबर को पता चल गया कि कोई सुन रहा है। कोई जानना चाहता है कि वह कैसी है।
और उसी दिन, जब उसे अपनी राय देने को कहा गया, तो उसने दी। ठीक नहीं, पर ईमानदार। गलत भी हो सकता था। पर कम से कम नीता ने अपनी जिम्मेदारी निभाई।
यह विज्ञापन नहीं है कि मंगलवार सुबह से नीता को महसूस हुआ कि सब कुछ ठीक है। नहीं। पर कुछ बदला था। सोमवार की खालीपन को मंगलवार की जिम्मेदारी ने बदल दिया। और यह दोनों एक दूसरे की जगह नहीं ले सके, पर एक साथ उन्होंने नीता के सप्ताह को कुछ अर्थ दिया।
क्यों यह गहरा है
कुछ संस्कृतियों में प्रार्थना केवल देवता से माँगना समझी जाती है। पर असल में, प्रार्थना का मतलब है: ईमानदारी से अपने आप से, अपने उद्देश्य से, और अपनी जिम्मेदारियों से बात करना। जब नीता ने अपनी टीम मेंबर से पूछा, "तुम कैसी हो?", तो वह एक तरह की प्रार्थना कर रही थी। जब उसने अपनी राय दी, तो वह अपनी जिम्मेदारी को पहचान रही थी।
ये छोटी जिम्मेदारियाँ, एक सवाल, एक राय, किसी और के लिए पचीस मिनट, ये ही हैं जो सप्ताह को खाली से भरे में बदल देती हैं। न कि छुट्टी के दिन की खुशी से। खुशी आती है और जाती है। पर यह जिम्मेदारी, यह उद्देश्य: यह रह जाती है। यह आपके साथ सोमवार को, मंगलवार को, और हर दिन को ले जाती है।
रविवार की खुशी न भूलो। पर उसे अपना अस्तित्व न समझो। अपना अस्तित्व अगले दिन की छोटी जिम्मेदारी से खोजो।
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